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Viva of PhD stuck in Corona's impact / lock down, UGC said - University can do online if you want

कोरोना का असर / लॉक डाउन में अटके पीएचडी के वायवा, UGC ने कहा - यूनिवर्सिटी चाहे तो करा सकती है ऑनलाइन


University Grant Commision
University Grant Commision


राजस्थान यूनिवर्सिटी में हर महीने करीब 20 पीएचडी थीसिस सबमिट होती हैं, लास्ट वायवा 20 मार्च को हुए, इसके बाद नहीं। 



जयपुर। 
कोरोना महामारी की वजह से हुए लॉकडाउन के बीच यूनिवर्सिटीज एमफिल, पीएचडी के छात्रों का वायवा ऑनलाइन भी करा सकती हैं। एक यूनिवर्सिटी के सवाल पर यूजीसी ने डिजिटल माध्यम से भी वायवा कराने की बात कही है। यूजीसी का कहना है कि यूनिवर्सिटीज में जिन छात्रों के वायवा लॉकडाउन की वजह से अटक गए हैं।


यूनिवर्सिटी चाहे तो गूगल क्लासरूम, जूम एप, स्काइप या अन्य ऑनलाइन प्लेटफार्म से वायवा करवा सकती है। लेकिन एक्सपर्ट चुनने से लेकर रिपोर्ट तैयार करने तक सभी नियमों की पालना हो। गौरतलब है कि शोधकर्ताओं द्वारा पीएचडी की थीसिस जमा होने के बाद एक्सपर्ट जांच करते हैं। एक्सपर्ट से चेक होने के बाद कुलपति द्वारा तय किए गए दूसरी यूनिवर्सिटी के एक्सपर्ट वायवा लेने आते हैं।



नियमों की पालना हो

यूजीसी के सेक्रेट्री प्रो. रजनीश जैन ने बताया कि एक यूनिवर्सिटी के सवाल पर हमने यह कहा है की  यूनिवर्सिटीज डिजिटल माध्यम से भी रिसर्च स्कॉलर का वायवा करवा सकती हैं, लेकिन उस दौरान यूजीसी के 2016 रेगुलेशन के नियमों की पालना सुनिश्चित हो। अभी विशेष परिस्थितियों में अगर यूनिवर्सिटी एक्सपर्ट की व्यवस्था करते हुए रिपोर्ट वगैरह नियमों के मुताबिक तैयार कर सकती है तो, वायवा कराए जा सकते हैं।



यूनिवर्सिटी की समस्या

राजस्थान यूनिवर्सिटी में हर महीने करीब 20 पीएचडी थीसिस सबमिट होती हैं। लास्ट वायवा 20 मार्च को हुए, इसके बाद नहीं। शोध के डायरेक्टर प्रो. एसएल शर्मा का कहना है कि पीएचडी की थीसिस सबमिट होने के बाद सुपरवाइजर और दो एक्सटर्नल एक्सपर्ट को कॉपी जाती है।

वहां से थीसिस की जांच हो कर ओके आने के बाद पीएचडी का वायवा होता है। दूसरी यूनिवर्सिटी का एक्सपर्ट वायवा लेने आता है। ऑनलाइन वायवा कराने में समस्या यह है कि इस समय लॉकडाउन के दौरान कैंडिडेट, सुपरवाइजर और एक्सपर्ट को कैसे तय किया जाए, कैसे जोड़ा जाए क्योंकि पहले से इसका कोई सिस्टम नहीं बना हुआ है।



ओपन वायवा का प्रावधान

शर्मा ने बताया कि ऑर्डिनेंस में ओपन वायवा का प्रावधान है। जिसके हिसाब से किसी रिसर्च स्कॉलर का वायवा हो रहा हो, उस दौरान कोई भी डीन, फैकल्टी मेंबर या अन्य रिसर्च स्कॉलर वहां आकर बैठ सकते हैं। ऑनलाइन कराया जाए तो यह भी संभव नहीं होगा।



इनका कहना है

अगर वायवा का काम ऑनलाइन होता है तो शोधकर्ताओं के साथ ही दूर से आने वाले एग्जामिनर का समय बचेगा। वर्क फ्रॉम होम और टेक्नोलॉजी का सदुपयोग होगा। भविष्य के लिए भी अच्छा उदाहरण बनेगा। 

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